अक्षय तृतीयाः आंतरिक क्षमता में वृद्धि का काल

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अक्षय तृतीया के नाम से जानी जाने वाली वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि, अनादि काल से ही स्वयं सिद्ध शुभ मुहर्तों में शुमार रही है। यह तिथि अपनी अद्वितीय आंतरिक क्षमता के लिये जानी और पहचानी जाती है।

इस तिथि में किये गये उपक्रम, क्रियाकलापों का आसानी से क्षय या ह्रास नहीं होता। पर हमारे ऋषियों नें इसे पदार्थों से ना जोड़कर विचारों से जोड़ा, मानसिक एवं आंतरिक क्षमता से बांधा, कर्मों से संलग्न किया। उन्होंने इस तिथि में उन सभी क्रियाकलापों या अभ्यास को प्रश्रय दिया जो हमारे स्थूल, लिंग, सूक्ष्म और कारण देह के जीवन में सफलता, आनंद, प्रेम और उत्साह के बीज भर दें। इन्हीं मूल्यों को जीवन में स्वर्ण का असली जनक माना गया। इसलिये इस दिन अध्ययन, साधना, उपासना, ध्यान, जप-तप, होम-हवन और दान जैसे नवीन कर्मों का प्राकट्य हुआ। शायद इसी वजह से हमें इस दिन सकारात्मक कर्मों को अपनाने के लिये प्रेरित किया गया, जिससे हमारे जीवन में सुख अक्षय होकर रह जाए क्योंकि शायद हमारे जीवन में हमारे सकारात्मक कर्म ही धन के असली सूत्र हैं।

अक्षय तृतीया पर सोना खरीदने से ज़्यादा बेहतर अध्ययन, असहायों की सहायता, दान के साथ जाप और उपासना है। पुराण कहते हैं कि इस दिन पूर्वजों यानि पित्रों का पिण्डदान, तर्पण तथा पिन्डदान और दान, अक्षय फल से सराबोर कर देता है। इस दिन श्वेत कमल या किसी भी सफ़ेद पुष्प से पूजन और बिल्वपत्र, बिल्व फल, कमलगट्टे, धान का लावा, खीर, काला तिल, जीरा, धनिया, शक्कर, शहद, गाय का घृत व रसीले फलों की आहुति की ग्रंथों में विशिष्ट महिमा बताई है।अक्खा तीज वसंत ऋतु के समापन और ग्रीष्म ऋतु के आगमन का संधिकाल भी है, इसलिए इस दिन सत्तू, ख़रबूज़ा, चावल, खीरा, ककड़ी,साग, इमली, जल के पात्र (जैसे सुराही, मटका, घड़ा, कसोरा, पुरवा यानि कुल्हड़) लकड़ी की चरण पादुका यानि खड़ाऊँ, छतरी, पंखे, जैसे सूर्य की तपिश से सुकून देने वाली वस्तुओं के दान देने की भी परंपरा है।

अक्षय तीज की गिनती युगादि तिथियों में होती है, ऐसा भविष्य पुराण कहता है। इसी दिन सतयुग और त्रेतायुग का आग़ाज़ हुआ था।ब्रह्मा के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण और परशुराम, नर-नारायण और हयग्रीव जैसे विष्णु के स्वरूपों प्राकट्य भी इसी अक्षय तृतीया को हुआ था।

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