महाशिवरात्रि मनोकामना पूरी करने का व्रत है

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पं.गणपति झा

नई दिल्ली, महाशिवरात्रि व्रत फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। इस व्रत को अर्धरात्रिव्यापिनी चतुर्दशी तिथि में करना चाहिये, चाहे यह तिथि पूर्वा (त्रयोदशीयुक्त) होनी चाहिए।

नारद संहिता के अनुसार जिस दिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि आधी रात के योगवाली हो उस दिन जो शिवरात्रि व्रत करता है, वह अनन्त फल को प्राप्त करता है। इस सम्बंध में तीन पक्ष हैं- 1. चतुर्दशी को प्रदोषव्यापिनी, 2. निशीथ (अर्धरात्रि) व्यापिनी एवं 3. उभयव्यापिनी। व्रतराज, निर्णयसिन्धु तथा धर्म सिन्धु आदि ग्रन्थों के अनुसार निशीथव्यापिनी चतुर्दशी तिथि को ही ग्रहण करना चाहिये।  ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रतिपदा आदि सोलह तिथियों के अग्नि आदि देवता स्वामी होते हैं, अतः जिस तिथि का जो देवता स्वामी होता है, उस देवता का उस तिथि में व्रत पूजन करने से उसे देवता की विशेष कृपा उपासक को प्राप्त होती है। चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं अथवा शिव की तिथि चतुर्दशी है। अतः इस तिथि की रात्रि में व्रत करने के कारण इस व्रत का नाम ‘शिवरात्रि’ होना उचित ही है।

इस व्रत को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्व, शूद्र, स्त्री-पुरूष और बाल-युवा-वृद्ध आदि सभी कर सकते हैं। जिस प्रकार श्रीराम, श्रीकृष्ण, वामन और नृसिंह जयंती तथा प्रत्येक एकादशी का व्रत हरेक को करना चाहिये, उसी प्रकार महाशिवरात्रि व्रत भी सभी को करना चाहिये। इसे न करने से दोष लगता है।

व्रत का महत्व:-
शिवपुराण की कोटिरूद्र संहिता में बताया गया है कि शिव रात्रि व्रत करने से व्यक्ति को भोग एवं मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं। ये चार व्रत हैं- 1. भगवान शिव की पूजा, 2. रूद्र मन्त्रों का जप, 3. शिव मंदिर में उपवास तथा, 4. काशी में देहत्याग। शिव पुराण में मोक्ष के चार सनातन मार्ग बताये गये हैं। इन चारों में भी शिवरात्रि व्रत का विशेष महत्व है। अतः इसे अवश्य करना चाहिये। यह सभी के लिये धर्म का उत्तम साधन है। निष्काम अथवा सकाम भाव से सभी मनुष्यों, वर्णों, आश्रमों, स्त्रियों, बालकों तथा देवताओं आदि के लिये यह महान् व्रत परम हितकारक माना गया है। प्रत्येक मास के शिवरात्रि व्रतों में भी फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी में होने वाले महाशिव रात्रि व्रत का शिवपुराण में विशेष माहात्म्य बताया गया है।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी का रहस्य:-
जहाँ तक प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थशी के शिवरात्रि
 कहलाने की बात है, वे सभी शिवरात्रि ही कहलाती हैं और पंचांगों में उन्हें इसी नाम से लिखा जाता है, परंतु फाल्गुन की शिवरात्रि महाशिव रात्रि के नाम से पुकारी जाती है। जिस प्रकार अमावास्या के दुष्प्रभाव से बचने के लिये उससे ठीक एक दिन पूर्व चतुर्दशी को यह उपासना की जाती है, उसी प्रकार क्षय होते हुये वर्ष के अन्तिम मास चैत्र से ठीक एक मास पूर्व फाल्गुन में ही इसका विधान शास्त्रों में मिलता है जो कि सर्वथा युक्ति संगत ही है। साथ ही रूद्रों के एकादश संख्यात्मक होने के कारण भी इस पर्व का 11वें मास (फाल्गुन) में सम्पन्न होना इस व्रतोत्सव के रहस्य पर प्रकाश डालता है।
पूजा विधि:-
शिव पुराण के अनुसार व्रती पुरूष को प्रातःकाल उठकर स्नान संध्या आदि कर्म से निवृत्त होने पर मस्तक पर भस्म का त्रिपुण्ड्र तिलक और गले में रूद्राक्ष माला धारण कर शिवालय में जाकर शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजन एवं शिव को नमस्कार करना चाहिये। तत्पश्चात् उसे श्रद्धापूर्वक व्रत का इस प्रकार संकल्प करना चाहिये-
शिवरात्रिव्रतं ह्येतत् करिष्येऽहं महाफलम्।
निर्विघ्नमस्तु मे चात्रा त्वत्प्रसादाज्जगत्पते।।
यह कहकर हाथ में लिये पुष्पाक्षय, जल आदि को छोड़ने के पश्चात् यह श्लोक पढ़ना चाहिये-
देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोऽस्तु ते।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव।।
तव प्रसादाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।
कामाद्याः शत्रावो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि।।
(शिवपु0 कोटिरूद्रसंहिता 38/28-29)

 

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