धारा 356 का महासंग्राम

उमेश कुमार/
नैनीताल हाइकोर्ट ने हरीश रावत सरकार को बहुमत साबित करने का वक्त दे दिया है। यानी राष्ट्रपति शासन का फैसला अदालत की नजर में सही नहीं ठहरा। हालांकि अदालत ने राष्ट्रपति शासन पर कोई टिप्पणी नहीं की है। ऐसे में अनुच्छेद 356 को लेकर बहस छिड़ना स्वाभाविक है। संविधान निर्माताओं ने धारा 356 का प्रावधान विषम और जटिल ​परिस्थितियों के लिए किया था। संविधान निर्माताओं को इस बात का जरा भी इलम न होगा कि इस धारा का जमकर राजनीतिक इस्तेमाल होगा। हुआ भी यही। संविधान की इस धारा का मनमाने तरीके से राजनीतिक फायदे के लिए हमेशा इस्तेमाल किया गया।
संविधान निर्माताओं ने धारा 356 से पहले धारा 355 की व्यवस्था की थी। जिसमें यह कहा गया था कि संघ का यह कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य की सरकार संविधान के उपबंधों के अनुसार चलती रहे। ऐसा न होने की स्थिति में धारा 356 की व्यवस्था की गई। इसके अनुसार जब राष्ट्रपति को यह समाधान हो जाता है कि किसी राज्य की सरकार संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चल सकती हो तो वह राष्ट्रपति शासन का उद्घोषणा कर सकता हैं। इसके लिए राज्यपाल के प्रतिवेदन या संघ का प्रतिवेदन माध्यम हो सकता है।
लेकिन देश के किसी भी राज्य में जब—जब धारा 356 का इस्तेमाल किया गया, नियमों को ताक पर रखकर किया गया। धारा 355 का इस्तेमाल कर पहले किसी भी राज्य संविधान के अनुरूप कार्य न करने की चेतावनी तक नहीं दी गई। सीधे ही संघ के प्रतिवेदन के आधार पर धारा 356 लगा दिया गया। धारा 356 लगाने के बाद केंद्र सरकार की हमेशा यह दलील रहती है कि राज्य में विधि व्यवस्था खराब हो चुकी थी। इसलिए इसका उपयोग किया जाना जरूरी था। इस विधि व्यवस्था के खराबी का पैमाना केंद्र सरकार की मनमर्जी से तय होता है। अपने इस पैमाने को सही ठहराने के लिए ऐसी—ऐसी दलीलें दी जाती है जिसको जांचा नहीं जा सकता है। शायद यही वजह है कि संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर को भी इस धारा को संविधान में रखने के साथ ही यह भान हो चुका था कि इसका दुरूपयोग होगा। इसलिए उन्होंने इस धारा को रखने के बाद संविधान सभा में कहा था कि ”… हम यह आशा करते है कि इन अनुच्छेदों के प्रयोग की आवश्यकता नहीं होगी और ये पुस्तक में ही बने रहेंगे। यदि इन्हें कभी प्रवृत किया जाता है तो मैं आशा करता हूं कि राष्ट्रपति किसी प्रांत के प्रशासन को निलंबित करने के पहले सभी उचित पुर्वावधानी बरतेंगे।”
यानी इस ​शक्ति के उचित उपयोग का अवसर तब होगा जब ​कोई मं​त्रिमंडल विधानमंडल में हार के बाद पदत्याग देता है और तुरंत ही विधान सभा में बहुमत वाला कोई अन्य मंत्रिमंडल नहीं बन पाता है। अनुच्छेद 356 के दुरूपयोग का सबसे ज्यादा विवाद 1977 में हुआ। जब बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल में 31 अप्रैल 1977 को राष्ट्रपति शासन लगाने की घोषणा की गई। इसके बाद से तो केंद्र में सत्ता बदलते ही राज्यों में विरोधी दलों की सरकार को निशाने पर लगाने के लिए इस अनुच्छेद का खासा दुरूपयोग होता रहा।
धारा 356 के दुरूपयोग पर सु्प्रीम कोर्ट ने मील का पत्थर साबित होना वाला जजमेंट दिया था। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एस आर बोम्मई को केंद्र सरकार ने 21 अप्रैल 1989 को टेलीफोन टेपिंग घोटाले में बर्खास्त कर दिया। बोम्मई ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने एस आर बोम्म्ई केस की सुनवाई करते हुए 11 मार्च 1994 को अपना फैसला सुनाया था। इस फैसले में इस बात का जिक्र था कि 1991 तक 41 वर्ष की आजादी में 82 बार राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। इतना ही नहीं संघ शासित राज्यों में भी इसे इस दौरान 13 बार लागू किया जा चुका था। यानी 41 साल में 95 बार राष्टपति शासन लगाया गया। कई सारे तथ्यों पर गौर करने के बाद संविधान पीठ ने अपना फैसला सुनाया था कि ​सरकार के बहुमत का फैसला विधानमंडल में होगा न​ कि राष्ट्रपति भवन में। राष्ट्रपति शासन लगाने से पहले सरकार को शक्ति परीक्षण का मौका दिया जाना चाहिए।
इसके बावजूद केंद्र सरकार द्वारा लगातार अनुच्छेद 356 का दुरूपयोग होता रहा है। विगत दिनों यह फिर से चर्चा में है। आखिर हो भी क्यों न। एक के बाद एक, दो राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। पहले अरूणाचल प्रदेश और फिर उत्तराखंड। दोनों मामले अभी अदालत में विचाराधीन हैं। अरूणाचल में केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति शासन हटाकर अपनी मनपसंद सरकारें भी बनवा ली। शायद उत्तराखंड में भी ऐसा ही होगा। राष्ट्रपति शासन का आधार तो और भी हास्यापद है। उत्तराखंड में इसके लिए एक स्टिंग आॅपरेशन को आधार बनाया गया। स्टिंग की सत्यता अभी जांची जानी है। पर राष्ट्रपति शासन मेें केंद्र ने कोई देरी नहीं की। राष्ट्रपति शासन लगाने के बाद केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने हरीश रावत की आलोचना करते हुए फेसबुक पर एक पोस्ट में कहा, ’18 मार्च को विनियोग विधेयक के सदन में नाकाम हो जाने के बाद जिसे पद छोड़ देना चाहिए था, उसने सरकार को बनाए रखकर राज्य को गंभीर संवैधानिक संकट में डाल दिया। इसके बाद सदन की स्थिति में बदलाव लाने के लिए मुख्यमंत्री ने लालच देने, खरीद-फरोख्त और अयोग्य ठहराने जैसे काम शुरू कर दिए। इससे स्थिति और जटिल हो गई।’
वित्त मंत्री जी यह भूल गए कि महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सरकार ने विनियोग विधेयक की बात तो दूर बहुमत ही उसी तरीके से हासिल किया जैसे हरीश रावत ने विनियोग विधयेक पास करवाया।
खैर जब तक धारा 356 पर महासंग्राम होता रहेगा, चर्चाएं इसके उपयोग और दुरूपयोग पर जारी रहेगी। कोई भी सरकार इसके दुरूपयोग से अछूती नहीं रही है।

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